प्रेमलता रसबिन्दु रचनाएं
गणित
जीवन एक गणित है,
हम उसके सवाल है।
जोड़, घटना गुणा, भाग में,
उलझा मानव का जीवन।
जीवन,,,,,, ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
ईश्वर है उसका निर्णायक,
समझ न पाया मानव।
सुख-दुख के भवसागर में
जीवन को जीता मानव।
जीवन,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
जैसे – जैसे सवालों को
मैं सुलझाती जाती हूँ।
फिर कुछ नये कुछ पुराने
सवाल आते जाते हैं।
जीवन,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
सुलझाते- सुलझाते न जाने
कब जीवन बीत गया।
समय की तेज धारा में
शेष गणित कैसे सुलझाएं।
जीवन,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,